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कैमरे के ठीक पीछे!

  • Feb 19
  • 3 min read



ज़िंदगी के इस पड़ाव तक पहुंचते-पहुंचते जाने कितनी ही चीजें इकट्ठी हो चुकी हैं जिनका हिसाब लगाना थोड़ा मुश्किल है । पर किसी एक चीज की बात सोचना चाहूँ तो एक घटना याद आती है।


2011 में, मैं अपनी पढ़ाई खत्म कर दिल्ली में नौकरी कर रहा था। छोटे से गाँव से उठकर जमशेदपुर, फिर पढ़ाई के 7 साल राँची और अब अचानक दिल्ली। कुछ ही दिन में समझ चुका था कि मैं यहाँ के लिए नहीं बना। अब मैं ज्यादा से ज्यादा दिल्ली अपने कैमरे में समेट लेना चाहता था, शायद फिर कभी ना लौटूँ, इस वहम में।



सुबह का वक्त था। मैं हौज खास के तालाब में सैवालों से उभर रही आकृतियों और सूरज की रोशनी को कैद कर रहा था। अचानक देखा, एक बच्चा शोर मचाता मेरी ओर दौड़ रहा है। पीछे से आती सूरज की हल्की सी रोशनी, मुझे लगा “वाह क्या तस्वीर है! पर मेरे क्लिक के साथ ही एक रौबदार आवाज सुनाई दी। बच्चे का पिता मुझे बिना इजाजत तस्वीर खींचने के लिए डांट रहा था। मुझपर जोर डाल रहा था कि अभी के अभी सारी तस्वीरें डिलीट कर दूँ। ऐसा मेरे साथ पहली बार हुआ था, तो मैं सहमा, और तुरंत खींची हुई तस्वीर डिलीट भी कर दी। बच्चे का पिता अब भी मानने को तैयार नहीं था। झट से कैमरा मेरे हाथ से खींच लिया और एक-एक कर बाकी तस्वीरें देखने लगा। पर सिवाय उन गहरे काले-हरे पैटर्न के, जब कुछ भी नहीं मिला तो मुझसे माफी मांगने लगा। उसे समझ आ चुका था की उनके बच्चे की एक तस्वीर जो शायद अच्छी हो सकती थी उन्होंने बिना देखे ही डिलीट करा दी थी।

हाँ अब मैं सहमा सा नहीं था । अब मैं मुस्कुरा रहा था।


मेरा मेरे कैमरा के साथ कुछ ऐसा ही रिश्ता है। प्रोफेशनल तौर पे कोई मुकाम नहीं, कोई उपलब्धि नहीं। पर जितना मिल सकता है या जितनी मिलनी चाहिए, उससे कहीं ज्यादा इज्जत दिलाई है इसने ।


जब बैंगलोर में भाषाई बंदिश में सहमा, तो सहकर्मियों की तस्वीरें खींच दोस्त बना लिए। कोई नया शहर...कोई नई इमारत...कोई नया दोस्त...या अपने रोजमर्रा के कामों में खींची जाने वाली बारीकियाँ, कैमरे ने मुझे हर जगह मदद की है।


जब मेरी पत्नी ने पत्नी बनने से पहले मुझसे पूछा कि  

“मैं तुम्हें कैसी लगती हूँ?

 कुछ तस्वीरें खींची और कहा -‘ऐसी’।


जब मैं बहुत प्रेम में था, तब भी तस्वीरें खींचता था। जब मैं प्रेम से निकालना चाहता था , तब भी तस्वीरें खींचता था। कॉलेज के दोस्त, juniors, सहपाठी, सहकर्मी, बॉस, स्टाफ, रिस्तेदार, प्रेमिका, पत्नी और अब मेरी बेटी, सब जानते हैं कि मैं कभी भी उनकी तस्वीर खींच सकता हूँ। तब नहीं जब वो चाहेंगे या सोचेंगे। तब, जब मुझे लगेगा ‘ अरे क्या बात है! ’।


2002 Kodak kb 10

2008 Canon sx100

2011 Nikon 5100 + 35mm लेंस

2019 Sony  alfa 6100 + 16 mm  + 50 mm  + 30mm  लेंस


इतने साल हो गए, ब्रांड्स भले ही बदले हों पर मेरे साथ एक कैमरा हमेशा रहा है। शायद इसलिए कि मेरे जैसे इन्ट्रोवर्ट इंसान के लिए यही एक जरिया है अपनी दिल की बात साफ-साफ रख पाने का। 



 

Objects of Our Affection is a series exploring our connections to the furniture and objects that make our spaces home. Through stories of tables, chairs, and that odd-shaped thing only you love, we celebrate the inanimate pieces that hold memory and witness our lives.

If you'd like to contribute your own story to this series, we'd love to hear from you. Micro-essays, poems, reflections, and fragments welcome. Write to us at hellothadi@gmail.com. Word limit 400.  

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